Saturday, April 25, 2009

चैत में गाई जाने वाली चैती

चैत्र के महीने में गाई जाने वाली उप-शास्त्रीय संगीत में एक प्रकार की बंदिश है चैती। इसमें रामा शब्द का प्रयोग बार बार होता है और इसमें कोयल की कूक, विरह, प्रेम, साजन से प्रेम निवेदन, और कई बार राम जी का वर्णन होता है। क्योंकि चैत्र मास में होली आती है, कई बार चैती में होली का वर्णन भी होता है। मन को छूने वाली चैती की जन्मभूमि बनारस मानी जाती है। बिहार में भी चैती गाई जाती है।

आज शुभा मुद्गल की आवाज़ में सुनते हैं ये चैती-

सपना देखीला पलकनवा हो रामा, सैंया के आवनवा

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आभार- ईस्निप्स डाट काम

Saturday, March 28, 2009

नवरात्रि पर भवानी दयानी और राग भैरवी का परिचय

नवरात्रि के अवसर पर प्रस्तुत है राग भैरवी पर आधारित परवीन सुल्ताना द्वारा गाया विख्यात- भवानी दयानी...

आइये इस सुंदर भजन को सुनने से पहले राग भैरवी के बारे में जानें-

रे ग ध नि कोमल राखत, मानत मध्यम वादी।
प्रात: समय जाति संपूर्ण, सोहत सा संवादी॥

इस राग की उत्पत्ति ठाठ भैरवी से मानी गई है। इसमें रे, ग, ध, और नि, कोमल लगते हैं और म को वादी तथा सा को संवादी स्वर माना गया है। गायन समय प्रात:काल है।

मतभेद-
इस राग में कुछ संगीतज्ञ प सा किंतु अधिकांश म-सा वादी संवादी मानते हैं।

विशेषता-

१.ये एक अत्यंत मधुर राग है और इस कारण इसे सिर्फ़ प्रात: समय ही नहीं बल्कि हर समय गाते बजाते हैं। सभी समारोहों का समापन इसी राग से करने की प्रथा सी बन गयी है।

२.आजकल इस राग में बारहों स्वर प्रयोग किये जाने लगे हैं, भले ही इसके मूल रूप में शुद्ध रे, ग, ध, नि लगाना निषेध माना गया है।

३.इससे मिलता जुलता राग है- बिलासखानी तोड़ी।

आरोह- सा रे॒ ग॒ म प ध॒ नि॒ सां।
अवरोह- सां नि॒ ध॒ प म ग॒ रे॒ सा।
पकड़- म, ग॒ रे॒ ग॒, सा रे॒ सा, ध़॒ नि़॒ सा। (़ = मन्द्र स्वर)


भवानी दयानी
महा वाकवानी
सुर-नर-मुनि जनमानी
सकल बुधज्ञानी

जगजननी जगदानी
महिषासुर मर्दिनी
ज्वालामुखी चंडी
अमर पददानी

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(आभार: परवीन सुल्ताना का ये भजन मुझे ईस्निप्स.काम पर मिला।)

Saturday, March 07, 2009

दो बंगला होली गीत- अजय चक्रवर्ती और मानवेन्द्र/श्यामल मित्र

इस पोस्ट में होली के अवसर पर दो बंगला होली गीतों का आनंद लीजिये-

पहले पंडित अजय चक्रवर्ती की आवाज़ में-

होली खेलीछे श्याम कुंज कानने



फिर कई रागों का मिश्रण इस गीत में। बसंत राग की छाया में रचा गया ये गीत मानवेन्द्र मुखर्जी और श्यामल मित्र की आवाज़ में सुनिये-

सुंदर नटवर खेलत होरी-



सभी को २००९ में होली की शुभकामनायें।

Wednesday, January 28, 2009

बसंत

( picture location: Buchart Garden, Victoria, Canada)
बसंत द्वार पर खड़ा है। ऐसे में सुनते हैं ये मधुर राग पं. राजन साजन मिश्र की आवाज़ में।

संक्षिप्त परिचय राग बसंत-

"दो मध्यम कोमल ऋषभ चढ़त न पंचम कीन्ह।
स-म वादी संवादी ते, यह बसंत कह दीन्ह॥

आरोह- सा ग, म॑ ध॒ रें॒ सां, नि सां।
अवरोह- रें॒ नि ध॒ प, म॑ ग म॑ ऽ ग, म॑ ध॒ ग म॑ ग, रे॒ सा।
पकड़- म॑ ध॒ रें॒ सां, नि ध॒ प, म॑ ग म॑ ऽ ग।

थाट- पूर्वी (प्रचलित)

इस राग के बारे में कुछ मतभेद भी हैं। पहले मतानुसार इस राग में केवल तीव्र मध्यम का प्रयोग होना चाहिये, मगर दूसरे मतानुसार दोनो म का प्रयोग होना चाहिये जो कि आज प्रचलन में है।

विशेषता- उत्तरांग प्रधान राग होने की वजह से इसमें तार सप्तक का सा ख़ूब चमकता है। शुद्ध म का प्रयोग केवल आरोह में एक विशेष तरह से होता है- सा म, म ग, म॑ ध॒ सां।
गायन समय
- रात्रि का अंतिम प्रहर (मगर बसंत ऋतु में इसे हर समय गाया बजाया जा सकता है।

इसे परज राग से बचाने के लिये आरोह में नि का लंघन करते हैं-

सा ग म॑ ध॒ सां
या
सा ग म॑ ध॒ रें॒ सां

विशेष स्वर संगतियाँ-

१) प म॑ ग, म॑ ऽ ग
२) म॑ ध॒ रें सां
३) सा म ऽ म ग, म॑ ध॒ रें॒ सां


Wednesday, November 12, 2008

नानक भजन - पंडित राजन साजन मिश्र

गुरु पूर्णिमा के अवसर पर नानक भजन, पं. राजन-साजन मिश्र द्वारा गाया, प्रस्तुत है-

Monday, October 27, 2008

शुभ दीपावली- राग दीपक

दीवाली के अवसर पर राग दीपक में सितार, शुजात खां से सुनिये।

राग दीपक के बारे में ये कहानी प्रसिद्ध है कि इसे जब तानसेन ने गाया था, और उनके शरीर में आग जितनी गर्मी पैदा हो गई थी तब उनकी बेटी ने मल्हार गा कर उन्हें शांत किया था। राग दीपक का शुद्ध रूप अब नहीं देखने को मिलता है। कहते हैं कि अट्ठारह शताब्दि में ही ये राग लुप्त होने लगा था, क्योंकि इसके गाने से गायक के शरीर में अत्यधिक गर्मी पैदा होने लगती थी।

थोड़ी जानकारी राग दीपक के बारे में-

राग दीपक को कभी ठाठ पूर्वी, तो कभी ठाठ बिलावल तो कभी ठाठ खमाज के अंतर्गत गाया बजाया जाता है।


जाति: षाडव संपूर्ण
वादि: सा
संवादी: प
गायन समय: रात्रि का दूसरा प्रहर


आरोह- सा ग मे प, ध॒ नी सां।
अवरोह- सां ध॒ प, मे ग रे॒ सा।


आइये सुनते हैं इस कठिन राग को शुजात खां से, पूर्वी ठाठ का राग दीपक। इसमें राग श्री की भी छाया है और शुद्ध मध्यम का प्रयोग। (सितार वादन के साथ, कुछ गायन भी...)



सभी को दीपावली की हार्दिक शुभकामनायें।

आभार: http://www.sawf.org/

Monday, September 29, 2008

जय जय दुर्गे -राग दुर्गा- राजन साजन मिश्र

मुल्तानी राग को आगे बढ़ाने से पहले, ये पोस्ट नवरात्रि के अवसर पर कर रही हूँ। राग दुर्गा में गाया हुआ, ताल एकताल, छोटा खयाल, मध्यलय में ,बनारस घराने के पं. राजन-साजन मिश्र की आवाज़ में उनका सुप्रसिद्ध,

स्थाई-

जय जय दुर्गे माता भवानी
सब जगत को दुख हरणी

अंतरा-

पाप निवारणी, महिषासुर मर्दिनी
रा्मदास शरण गये भवानी दयानी शिवानी

राग दुर्गा के बारे में थोड़ी सी जानकारी-

ये राग, ठाठ बिलावल से उत्पन्न हुआ है और रात्रि के द्वितीय प्रहर में गाया-बजाया जाता है। इस राग में गंधार (ग) और निषाद (नि) का उपयोग नहीं होता है अर्थात ये स्वर वर्ज्य हैं। और बाक़ी सभी स्वर शुद्ध हैं। इस तरह इसकी जाति हुई औडव-औडव अर्थात आरोह में और अवरोह में पाँच स्वरों का प्रयोग। (परिभाषायें देखें)। वादी स्वर मध्यम (म) और संवादी स्वर षडज (सा) है।


आरोह- सा रे म रे प ध सां।
अवरोह - सां ध प ध म रे ध सा।
पकड़ - सा ध म प ध म रे ध़ सा।



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Saturday, September 27, 2008

मुल्तानी में बंदिश

पिछले पोस्ट में मुल्तानी राग के मूलभूत बातों को हमने जाना और आलाप किया।

आइये अब मुल्तानी का गाना सीखें। ये बंदिश मेरी गुरु श्रीमति विमल सोनी जी से मुझे मिली थी। जैसा सीखा था वैसा ही पेश कर रही हूँ। हो सकता है किन्हीं और उस्तादों ने इसे गाई भी हो, अलग तरह से।

छोटा ख़्याल गाने की विधि के बारे में मैंने भूपाली राग सिखाते समय बताया है। एक बार दोहरा दूँ।
किसी भी राग में कोई भी बंदिश गाने से पहले उस राग विशेष का समां बाँधना ज़रूरी होता है। इसलिये, आरोह, अवरोह, पकड़, आलाप आदि गा कर राग को स्थापित किया जाता है। फिर बड़ा खयाल और छोटा खयाल आदि गा कर राग के स्वरूप को और निखारा जाता है। प्रचलन में पहले बड़ा खयाल (जो कि विलम्बित लय में चलता है) के बाद छोटे खयाल (मध्य या द्रुत लय) गाने की प्रथा है, पर कई बार गायक छोटा खयाल ऐसे भी गा सकता है। छोटे ख़याल को गाते समय उसे छोटे छोटे आलाप, और तानों से सँवारा जाता है। तान द्रुत गति से दुगुन या चौगुन में गाते हैं।स्वरलिपि: (मैं भातखंडे स्वरलिपि पद्धति का इस्तेमाल कर रही हूँ, जो कि एक सरल पद्धति है) । संगीत के छात्र को चाहिये कि वो पहले स्वरलिपि के स्वरों को याद कर के गाये और बाद में गीत के शब्द उनमें बैठा ले। अर्थात निम्नलिखित गाने में पहले सरलिपि के स्वरों को गा कर अभ्यास कर ले, फिर गीत के शव्दों को स्वरों मॆं ढाले।ताल और लय- किसी भी बंदिश को गाते समय ताल और लय का खयाल रखना ज़रूरी होता है। विभिन्न मात्राओं के विविध समुह को ताल कहते हैं। स्वर और लय ही संगी का आधार है। प्रत्येक ताल के कुछ निश्चित बोल होते हैं। बोल धा, धिन, कित, आदि वर्णों से निर्मित होते हैं। तीन ताल १६ मात्राओं का होता है।सुविधा के लिये प्रत्येक ताल को छोटे छोटे विभागों में विभाजित किया गया है। प्रत्येक ताल के विभागों की संख्या निश्चित होती है। जैसे कि तीनताल में ४ विभाग हैं। गायक गाते समय हाथ से हर विभाग पर ताल देता है और उसे पता होता है कि वो किस मात्रा पर है। जिस मात्रा पर गाते समय ज़ोर पड़े वहाँ सम माना जाता है जो कि किसी भी ताल की पहली मात्रा मानी जाती है। सम को स्वरलिपि में एक क्रास चिन्ह से दर्शाया जाता है। सम के अलावा खाली (जहाँ तबले में ड्ग्गा नहीं बजता) और ताली अन्य विभागों की प्रथम मात्रा है। खाली को स्वरलिपि में शून्य से दर्शाया जाता है।
अब गाना और गाने की स्वरलिपि:

स्थाई:
संदर सुरजनवा साईं रे
साईं रे मन भाई रे

अंतरा:
निसदिन तुम्हरो ध्यान धरत है
आन मिले रब साई रे

स्वरलिपि-

स्थाई:-
...............।..............।..............।.............प - ।
...............।..............।..............।............सुं ऽ ।


------------० --------------३ ---------------x -------------२
प ग॒ म॑ ग॒ । रे॒ रे॒ सा सा । ऩि सा म॑ ग॒ । म॑ प - - ।
द र सु र । ज न वा ऽ । सा ऽ ई ऽ । रे ऽ ऽ ऽ ।

प प - ध॒ । प ग॒ म॑ प । नि पनि सां नि । ध॒ प प - ।
ऽ सा ऽ ई । रे ऽ म न । ऽ भाऽ ई ऽ । रे ऽ सुं ऽ ।

अंतरा:

प ग॒ म॑ प । नि नि सां सां । नि नि सां गं॒ । रें॒ रें॒ सां -
नि स दि न । तु म्ह रो ऽ । ध्या ऽ न ध । र त हैं ऽ

नि - सां गं॒ । रें॒ - सां सां । म॑प सां नि ध॒ । प ग॒ प ऽ
आ ऽ न मि । ले ऽ र ब । सां ऽ ई ऽ । रे ऽ सुं द

(यह बंदिश मुझे मेरी गुरु श्रीमती विमल सोनी से प्राप्त हुई थी)

अभी भीमसेन जोशी की आवाज़ में एक प्रसिद्ध बंदिश



राग की बारीकि़यों पर ध्यान दें।

Thursday, July 24, 2008

राग मुल्तानी:


इस पोस्ट में राग मुल्तानी पेश है।

*नीचे आप जहाँ भी ~ चिन्ह देखें, ये मीड़ दर्शाने के लिये है।
*और ( ) खटका दिखाने के लिये। अर्थात अगर (सा) दिखाया गया है तो इसे 'रे सा ऩि सा' गाया जायेगा।

राग परिचय:

थाठ: तोड़ी
वादी: प
संवादी: सा
जाति: औडव-संपूर्ण
आरोह में रे और ध वर्जित स्वर हैं
गायन समय: दिन का चौथा प्रहर
स्वर:- कोमल रे, कोमल ग, तीव्र म का प्रयोग, बाकी सब स्वर शुद्ध

आरोह: ऩि सा म॑‍~ग॒ म॑~प, नि सां

अवरोह: सां नि ध॒ प, म॑ ग॒ म॑ ग॒, रे॒ सा।

पकड़: ऩि सा म॑~ग॒ ऽ म॑ प, म॑ ग॒ म॑ ऽ ग॒ रे॒ सा।

कुछ विशेषतायें-

तोड़ी थाठ से होते हुये भी ये राग तोड़ी की प्रकृति का तो है मगर तोड़ी से बहुत भिन्न है।

इसे गाते बजाते वक्त कुछ विशेष बातों का ध्यान रखना ज़रूरी है।

१) बहुधा इस राग में आलाप तान मन्द्र निषाद से प्रारम्भ करते हैं। ऩि सा ग॒~म॑ प...

२) कोमल ग का प्रयोग तीव्र म के साथ मीड़ में होता है और ये इस राग की खा़स बात है। इसी तरह, कोमल रे को गाते समय कोमल ग का कण लगता है। इस तरह से कोमल रे और कोमल ग अपने स्थान ने थोड़े चढ़े हुये होते हैं। तीव्र म भी प के करीब है।

३) इस राग में शुद्ध रे और शुद्द ध लगा देने से राग मधुवंती बन जाता है।

आइये पहले कुछ आलाप करें। अगले पोस्ट में गाना।

१) सा, ऩि सा ग॒ रे॒ सा, (सा) ऩि सा म॑ ग॒ ऽ म॑ प, म॑ ग॒ म॑ ग॒ रे॒ सा, ऩि सा ग॒ रे॒ सा।

२) म॑~ग॒ ऽ म॑ प, (प) म॑ ग॒ म॑ प, ऩि सा ग॒ म॑ प, सा प ऽ प, म॑ प ग॒ ऽ म॑ प ऽ ऽ प, (प) म॑ ग॒ म॑ ग॒ रे॒ सा।

३) ग॒ म॑ प ऩि ऽ नि सां, सां प नि सां गं॒ रें॒ सां, नि सां मं॑ गं॒ रें॒ सां, गं॒ रें॒ सां, नि सां नि ध॒ प, प~ ग॒ ऽ म॑ प नि ध॒ प, ध॒ प म॑ प ग॒ ऽ ऩि सा म॑~ ग॒ प~म॑ ध॒~प म॑ ग॒ रे॒ सा, ऩि सा ग॒ रे॒ सा।

Monday, December 24, 2007

सरस्वती स्तोत्र (श्लोक)

किसी भी कर्यक्रम की शुरुआत आज भी भारत में देवी सरस्वती को नमन करके किया जाता है। प्रस्तुत है ये श्लोक जो हम बचपन में स्कूल के कार्यक्रमों में गाते थे।

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Thursday, October 11, 2007

राग भूपाली -आगे (बंदिश सिखाने की कोशिश)



इस लेख में जल्द ही राग भूपाली को गा कर सिखाया जायेगा। कुछ तकनीकी वजहों से यहाँ पर पोस्ट की गई आवाज़ को मिटाया गया है। असुविधा के लिये खेद है।

गायक को कुछ बातों पर ध्यान देना चहिये । जैसे कि कुछ रागों के स्वर एक ही होते हैं मगर भिन्न स्वर समुह के प्रयोग से या न्यास के स्वर बदल जाने से, अथवा, राग के चलन से दोनों बिल्कुल एक स्वर वाले राग भी बिल्कुल पृथक होते हैं। अत: गाते बजाते समय इन बातों का खयाल रखना बहुत ज़रूरी है जिस

राग भूपाली जैसा ही राग है- राग देसकार। दोनों में ही 'सा रे ग प ध' स्वरों का प्रयोग होता है, मगर दोंनों रागों का ठाठ अलग है, न्यास के स्वर अलग हैं और एक पूर्वांग तो दूसरा उत्तरांग प्रधान राग है।

भूपाली में ध्यान दें कि सा ध़ सा रे ग का प्रयोग बहुत होता है। ये इसका मुख्य स्वर समुह है, ग का बहुतायत से प्रयोग होता है।

http://www.sawf.org/audio/bhoop/fhk_bhoop.ram

http://www.sawf.org/audio/bhoop/bgak_bhoop.ram

http://www.sawf.org/newedit/edit08052002/musicarts.asp

मैं इन सभी वेब साइट को प्रकाशित करने वालों की भूरि भूरि प्रशंसा करती हूँ और धन्यवाद ज्ञापन भी ।

Tuesday, November 28, 2006

राग भूपाली (बंदिश और परिचय)

राग भूपाली में बंदिश गाने से पहले निम्नलिखित आवश्यक जानकारी को पढ़ें:

छोटा खयाल गाने की विधि:
किसी भी राग में कोई भी बंदिश गाने से पहले उस राग विशेष का समां बाँधना ज़रूरी होता है। इसलिये, आरोह, अवरोह, पकड़, आलाप आदि गा कर राग को स्थापित किया जाता है। फिर बड़ा खयाल और छोटा खयाल आदि गा कर राग के स्वरूप को और निखारा जाता है। प्रचलन में पहले बड़ा खयाल (जो कि विलम्बित लय में चलता है) के बाद छोटे खयाल (मध्य या द्रुत लय) गाने की प्रथा है, पर कई बार गायक छोटा खयाल ऐसे भी गा सकता है। छोटे ख़याल को गाते समय उसे छोटे छोटे आलाप, और तानों से सँवारा जाता है। तान द्रुत गति से दुगुन या चौगुन में गाते हैं।

स्वरलिपि: (मैं भातखंडे स्वरलिपि पद्धति का इस्तेमाल कर रही हूँ, जो कि एक सरल पद्धति है) । संगीत के छात्र को चाहिये कि वो पहले स्वरलिपि के स्वरों को याद कर के गाये और बाद में गीत के शब्द उनमें बैठा ले। अर्थात निम्नलिखित गाने में पहले सरलिपि के स्वरों को गा कर अभ्यास कर ले, फिर गीत के शव्दों को स्वरों मॆं ढाले।

ताल और लय- किसी भी बंदिश को गाते समय ताल और लय का खयाल रखना ज़रूरी होता है। विभिन्न मात्राओं के विविध समुह को ताल कहते हैं। स्वर और लय ही संगी का आधार है। प्रत्येक ताल के कुछ निश्चित बोल होते हैं। बोल धा, धिन, कित, आदि वर्णों से निर्मित होते हैं। तीन ताल १६ मात्राओं का होता है।
सुविधा के लिये प्रत्येक ताल को छोटे छोटे विभागों में विभाजित किया गया है। प्रत्येक ताल के विभागों की संख्या निश्चित होती है। जैसे कि तीनताल में ४ विभाग हैं। गायक गाते समय हाथ से हर विभाग पर ताल देता है और उसे पता होता है कि वो किस मात्रा पर है। जिस मात्रा पर गाते समय ज़ोर पड़े वहाँ सम माना जाता है जो कि किसी भी ताल की पहली मात्रा मानी जाती है। सम को स्वरलिपि में एक क्रास चिन्ह से दर्शाया जाता है। सम के अलावा खाली (जहाँ तबले में ड्ग्गा नहीं बजता) और ताली अन्य विभागों की प्रथम मात्रा है। खाली को स्वरलिपि में शून्य से दर्शाया जाता है।

राग भूपाली में निम्नलिखित बंदिश तीनताल में है।

राग भूपाली

राग परिचय-

थाट- कल्याण
वर्जित स्वर- म, नि
जाति- औडव-औडव
वादी- ग
संवादी-ध
गायन समय- रात्रि का प्रथम प्रहर

इस राग का चलन मुख्यत: मन्द्र और मध्य सप्तक के प्रतह्म हिस्से में होती है (पूर्वांग प्रधान राग)। इस राग में ठुमरी नहीं गायी जाती मगर, बड़ा खयाल, छोटा खयाल, तराना आदि गाया जाता है। कर्नाटक संगीत में इसे मोहन राग कहते हैं।

आरोह- सा, रे, ग, प, ध, सा।
अवरोह- सां, ध, प, ग, रे, सा।
पकड़- प ग, रे ग।, सा रे, ध़ सा।

छोटा खयाल- (तीन ताल मध्यलय)

स्थाई

धनधन कृष्न मुरारी तुम
कृष्न गोवर्धन धारी

अंतरा

कोई कहत तुम कृष्न कन्हैया
कोई कहत भव सिंद्युतरैया
कोई कहत तुम सबदुखहारी

स्वरलिपि:

स्थाई

० --------२------------- x---------- ३---------
ग रे ग रे । सा ध़ सा रे । प - ग - रे ग सा रे
ध न ध न । कृ॒ ऽ ष्न मु । रा ऽ री ‍ऽ । ऽ ऽ तु म ।

ग - ग रे । ग प ध सां । धसां धप धसां रेंगं । रेंसां धप गरे सा
कृ ऽ ष्न गो। व र ध न। धाऽ ऽऽ ऽऽ ऽऽ । रीऽ ‌ऽऽ ऽऽ ऽऽ ।

अंतरा

प - प ग । प प सां ध । सां - सां ध । सां - सां सां
को ऽ ई क । ह त तु म । कृ ऽ ष्न क । न्है ऽ या ऽ

ध - ध ध । सां - सां रे । सां रें गं रें सां सां ध प ।
को ऽ ई क । ह त भ व । सिं ऽ द्यु त । रै ऽ या ऽ

ग - ग - रे। ग प ध सां । धसां धप धसां रेंगं । रेंसां धप गरे सा
को ऽ ई क । ह त तु म। सऽ बऽ दुऽ खऽ । हाऽ ऽऽ रीऽ ऽऽ ।

आभार:( गीत मेरे गुरु, श्रीमति जयश्री चक्रवर्ती से मुझे मिला था, मुझे ज्ञात नहीं कि ये कहाँ प्रकाशित हुआ होगा)

तान: (चंद उदाहरण)

खाली से ८ मात्रा बाद शुरु करें-

१) सारे गप धसां धप। गप धप गरे सा
२) सारे गरे गप धसां । धप गरे गरे सा
३) सासा रेग रेग पध । सांध पग रेग सारे
४)सांसां धप गप धसां । रेंसां धप गरे सा

१६ मात्रा बाद शुरु करें-

१) सारे गरे साध़ सारे । गरे गप धप गरे । सारे गप धसां धप । रेंसां धप गरे सा।
२)गग रेग गसा रेरे । ध़सा साप पग पप ।गग रेग गरे रेसा । धध पप गरे सा।

Tuesday, September 26, 2006

संगीत संबंधी कुछ ज़रूरी परिभाषायें -२

थाट- सप्तक के १२ स्वरों में से ७ क्रमानुसार मुख्य स्वरों के समुदाय को थाट कहते हैं। थाट से राग उत्पन्न होते हैं। थाट को मेल भी कहा जाता है। थाट के कुछ लक्षण माने गये हैं- १) किसी भी थाट में कम से कम सात स्वरों का प्रयोग ज़रूरी है। २) थाट में स्वर स्वाभाविक क्रम में रहने चाहिये। अर्थात सा के बाद रे, रे के बाद ग आदि। ३) थाट को गाया ब्जाया नहीं जाता। इससे किसी राग की रचना की जाती है जिसे गाया बजाया जाता है। ४) एक थाट से कई रागों की उत्पत्ति हो सकती है। आज हिन्दुस्तानी संगीत पद्धति में १० ही थाट माने जाते हैं।

विभिन्न थाटों के नाम व उनके स्वर-

(नोट: कोमल स्वरों के नीचे एक रेखा दिखायी जाती है, जैसे ग॒। तीव्र म के ऊपर एक रेखा दिखायी जाती है जैसे- म॑)

१) बिलावल थाट- सा, रे, ग, म, प, ध, नि

२) कल्याण- सा, रे,ग, म॑, प ध, नि

३) खमाज- सा, रे ग, म, प ध, नि॒

४) आसावरी- सा, रे, ग॒, म, प ध॒, नि॒

५) काफ़ी- सा, रे, ग॒,म, प, ध, नि॒

६) भैरवी- सा, रे॒, ग॒, म, प ध॒, नि॒

७) भैरव- सा, रे॒, ग, म, प, ध॒ नि

८) मारवा- सा, रे॒, ग, म॑, प, ध नि

९) पूर्वी- सा, रे॒, ग, म॑, प ध॒, नि

१०) तोड़ी- सा, रे॒, ग॒, म॑, प, ध॒, नि

राग- कम से कम पाँच और अधिक से अधिक ७ स्वरों से मिल कर बनता है राग। राग को गाया बजाया जाता है और ये कर्णप्रिय होता है। किसी राग विशेष को विभिन्न तरह से गा-बजा कर उसके लक्षण दिखाये जाते है, जैसे आलाप कर के या कोई बंदिश या गीत उस राग विशेष के स्वरों के अनुशासन में रहकर गा के आदि।

पकड़- पकड़ वह छोटा सा स्वर समुदाय है जिसे गाने-बजाने से किसी राग विशेष का बोध हो जाये। उदाहरणार्थ- प रे ग रे, .नि रे सा गाने से कल्याण राग का बोध होता है।

वर्ज्य स्वर- जिस स्वर का राग में प्रयोग नहीं होता है उसे वर्ज्य स्वर कहते हैं। जैसे कि राग भूपाली में सा, रे, ग, प, ध स्वर ही लगते हैं। अर्थात म और नि वर्ज्य स्वर हुये।

जाति- किसी भी राग कि जाति मुख्यत: तीन तरह की मानी जाती है। १) औडव - जिस राग मॆं ५ स्वर लगें २) षाडव- राग में ६ स्वरों का प्रयोग हो ३) संपूर्ण- राग में सभी सात स्वरों का प्रयोग होता हो इसे आगे और विभाजित किया जा सकता है। जैसे- औडव-संपूर्ण अर्थात किसी राग विशेष में अगर आरोह में ५ मगर अवरोह में सातों स्वर लगें तो उसे औडव-संपूर्ण कहा जायेगा। इसी तरह, औडव-षाडव, षाडव-षाडव, षाडव-संपूर्ण, संपूर्ण-षाडव आदि रागों की जातियाँ हो सकती हैं।

वादी स्वर- राग का सबसे महत्वपूर्ण स्वर वादी कहलाता है। इसे राग का राजा स्वर भी कहते हैं। इस स्वर पर सबसे ज़्यादा ठहरा जाता है और बार बार प्रयोग किया जाता है। किन्हीं दो रागों में एक जैसे स्वर होते हुये भी उन में वादी स्वर के प्रयोग के द्वारा आसानी से फ़र्क बताया जा सकता है। जैसे कि राग भूपाली में और राग देशकार में एक जैसे स्वर लगते हैं- सा, रे, ग, प, ध मगर राग भूपाली में ग वादी है और राग देशकार में ध स्वर को वादी माना गया है। इस तरह से दोनों रागों के स्वरूप बदल जाते हैं।

संवादी स्वर- राग का द्वितीय महत्वपूर्ण स्वर होता है संवादी। इसे वादी से कम मगर अन्य स्वरों से ज़्यादा प्रयोग किया जाता है। इसे वादी स्वर का सहायक या राग का मंत्री स्वर भी कहते हैं। वादी और संवादी में ४-५ स्वरों की दूरी होती है। जैसे अगर किसी राग का वादी स्वर है रे तो संवादी शायद ध या नि हो सकता है।

अनुवादी स्वर- वादी और संवादी के अलावा राग में प्रयुक्त होने वाले सभी अन्य स्वर अनुवादी कहलाते हैं।

विवादी स्वर- जो स्वर राग में प्रयुक्त नहीं होता उसे विवादी कहते हैं। कभी कभी जब गायक या बजाने वाला राग का स्वरूप स्थापित कर लेता है, तो राग की सुंदरता बढ़ाने के लिये विवादी स्वर का प्रयोग कर सकता है, मगर विवादी स्वर का बार बार प्रयोग राग का स्वरूप बिगाड़ देता है।

आलाप- राग के स्वरों को विलम्बित लय में विस्तार करने को आलाप कहते हैं। आलाप को आकार की सहायता से या नोम, तोम जैसे शब्दों का प्रयोग करके किया जा सकता है। गीत के शब्दों का प्रयोग कर के जब आलाप किया जाता है तो उसे बोल-आलाप कहते हैं।

तान- राग के स्वरों को द्रुत गति से विस्तार करने को तान कहते हैं। तानों को आकार में या गीत के बोल के साथ (बोल-तान) अथवा स्वरों के प्रयोग द्वारा किया जा सकता है।

(संगीत में परिभाषाओं का अंत नहीं। आगे की कड़ी मॆं हम किसी राग विशेष के बारे में जानने की कोशिश करेंगे और जब जहाँ भी ज़रूरत होगी आगे और परिभाषाओं से अवगत कराया जायेगा।)

Wednesday, July 12, 2006

संगीत संबंधी कुछ ज़रूरी परिभाषायें -१

आइये अब संगीत संबंधी कुछ परिभाषाओं पर ध्यान दें।

संगीत- बोलचाल की भाषा में सिर्फ़ गायन को ही संगीत समझा जाता है मगर संगीत की भाषा में गायन, वादन व नृत्य तीनों के समुह को संगीत कहते हैं। संगीत वो ललित कला है जिसमें स्वर और लय के द्वारा हम अपने भावों को प्रकट करते हैं। कला की श्रेणी में ५ ललित कलायें आती हैं- संगीत, कविता, चित्रकला, मूर्तिकला और वास्तुकला। इन ललित कलाओं में संगीत को सर्वश्रेष्ठ माना गया है।

संगीत पद्धतियाँ- भारतवर्ष में मुख्य दो प्रकार का संगीत प्रचार में है जिन्हें संगीत पद्धति कहते हैं। उत्तरी संगीत पद्धति व दक्षिणी संगीत पद्धति । ये दोनों पद्धतियाँ एक दूसरे से अलग ज़रूर हैं मगर कुछ बातें दोनों में समान रूप से पायी जाती हैं।

ध्वनि- वो कुछ जो हम सुनते हैं वो ध्वनि है मगर संगीत का संबंध केवल उस ध्वनि से है जो मधुर है और कर्णप्रिय है। ध्वनि की उत्पत्ति कंपन से होती है। संगीत में कंपन (वाइब्रेशन) को आंदोलन कहते हैं। किसी वाद्य के तार को छेड़ने पर तार पहले ऊपर जाकर अपने स्थान पर आता है और फिर नीचे जाकर अपने स्थान पर आता है। इस प्रकार एक आंदोलन पूरा होता है। एक सेकंड मॆं तार जितनी बार आंदोलित होता है, उसकी आंदोलन संख्या उतनी मानी जाती है। जब किसी ध्वनि की आंदोलन एक गति में रहती है तो उसे नियमित और जब आंदोलन एक रफ़्तार में नहीं रहती तो उसे अनियमित आंदोलन कहते हैं। इस तरह जब किसी ध्वनि की अंदोलन कुछ देर तक चलती रहती है तो उसे स्थिर आंदोलन और जब वो जल्द ही समाप्त हो जाती है तो उसे अस्थिर आंदोलन कहते हैं।

नाद- संगीत में उपयोग किये जाने वाली मधुर ध्वनि को नाद कहते हैं। अगर ध्वनि को धीरे से उत्पन्न किया जाये तो उसे छोटा नाद और ज़ोर से उत्पन्न किया जाये तो उसे बड़ा नाद कहते हैं।

श्रुति- एक सप्तक (सात स्वरों का समुह) में सा से नि तक असंख्य नाद हो सकते हैं। मगर संगीतज्ञों का मानना है कि इन सभी नादों में से सिर्फ़ २२ ही संगीत में प्रयोग किये जा सकते हैं, जिन्हें ठीक से पहचाना जा सकता है। इन बाइस नादों को श्रुति कहते हैं।

स्वर- २२ श्रुतियों में से मुख्य बारह श्रुतियों को स्वर कहते हैं। इन स्वरों के नाम हैं - सा(षडज), रे(ऋषभ), ग(गंधार), म(मध्यम), प(पंचम), ध(धैवत), नि(निषाद) अर्थात सा, रे, ग, म, प ध, नि स्वरों के दो प्रकार हैं- शुद्ध स्वर और विकृत स्वर। बारह स्वरों में से सात मुख्य स्वरों को शुद्ध स्वर कहते हैं अर्थात इन स्वरों को एक निश्चित स्थान दिया गया है और वो उस स्थान पर शुद्ध कहलाते हैं। इनमें से ५ स्वर ऐसे हैं जो शुद्ध भी हो सकते हैं और विकृत भी अर्थात शुद्ध स्वर अपने निश्चित स्थान से हट कर थोड़ा सा उतर जायें या चढ़ जायें तो वो विकृत हो जाते हैं। उदाहरणार्थ- अगर शुद्ध ग आठवीं श्रुति पर है और वो सातवीं श्रुति पर आ जाये और वैसे ही गाया बजाया जाये तो उसे विकृत ग कहेंगे। जब कोई स्वर अपनी शुद्ध प्रकार से नीचे होता है तो उसे कोमल विकृत और जब अपने निश्चित स्थान से ऊपर हट जाये और गाया जाये तो उसे तीव्र कहते हैं। सा और प अचल स्वर हैं जिनके सिर्फ़ शुद्ध रूप ही हो सकते हैं।

सप्तक- क्रमानुसार सात शुद्ध स्वरों के समुह को सप्तक कहते हैं। ये सात स्वर हैं- सा, रे, ग, म, प, ध, नि । जैसे-जैसे हम सा से ऊपर चढ़ते जाते हैं, इन स्वरों की आंदोलन संख्या बढ़ती जाती है। 'प' की अंदोलन संख्या 'सा' से डेढ़ गुनी ज़्यादा होती है। 'सा' से 'नि' तक एक सप्तक होता है, 'नि' के बाद दूसरा सप्तक शुरु हो जाता है जो कि 'सा' से ही शुरु होगा मगर इस सप्तक के 'सा' की आंदोलन संख्या पिछले सप्तक के 'सा' से दुगुनी होगी। इस तरह कई सप्तक हो सकते हैं मगर गाने बजाने में तीन सप्तकों का प्रयोग करते हैं।
१) मन्द्र २) मध्य ३) तार । संगीतज्ञ साधारणत: मध्य सप्तक में गाता बजाता है और इस सप्तक के स्वरों का प्रयोग सबसे ज़्यादा करता है। मध्य सप्तक के पहले का सप्तक मंद्र और मध्य सप्तक के बाद आने वाला सप्तक तार सप्तक कहलाता है।

क्रमश:

Saturday, May 27, 2006

सात स्वर, अलंकार और हारमोनियम


भारतीय संगीत आधारित है स्वरों और ताल के अनुशासित प्रयोग पर। सात स्वरों के समुह को सप्तक कहा जाता है। भारतीय संगीत सप्तक के सात स्वर हैं-

सा(षडज), रे(ऋषभ), ग(गंधार), म(मध्यम), प(पंचम), ध(धैवत), नि(निषाद)


अर्थात

सा, रे, ग, म, प ध, नि

सा और को अचल स्वर माना जाता है। जबकि अन्य स्वरों के और भी रूप हो सकते हैं। जैसे 'रे' को 'कोमल रे' के रूप में गाया जा सकता है जो कि शुद्ध रे से अलग है। इसी तरह 'ग', 'ध' और 'नि' के भी कोमल रूप होते हैं। इसी तरह 'शुद्ध म' को 'तीव्र म' के रूप में अलग तरीके से गाया जाता है।


गायक या वादक गाते या बजाते समय मूलत: जिस स्वर सप्तक का प्रयोग करता है उसे मध्य सप्तक कहते हैं। ठीक वही स्वर सप्तक, जब नीचे से गाया जाये तो उसे मंद्र, और ऊपर से गाया जाये तो तार सप्तक कह्ते हैं। मन्द्र स्वरों के नीचे एक बिन्दी लगा कर उन्हें मन्द्र बताया जाता है। और तार सप्तक के स्वरों को, ऊपर एक बिंदी लगा कर उन्हें तार सप्तक के रूप में दिखाया जाता है। इसी तरह अति मंद्र और अतितार सप्तक में भी स्वरों को गाया-बजाया जा सकता है।

अर्थात- ध़ ऩि सा रे ग म प ध नि सां रें गं...

संगीत के नये विद्यार्थी को सबसे पहले शुद्ध स्वर सप्तक के सातों स्वरों के विभिन्न प्रयोग के द्वारा आवाज़ साधने को कहा जाता है। इन को स्वर अलंकार कहते हैं।

आइये कुछ अलंकार देखें

१) सा रे ग म प ध नि सां (आरोह)

सां नि ध प म ग रे सा (अवरोह)

(यहाँ आखिरी का सा तार सप्तक का है अत: इस सा के ऊपर बिंदी लगाई गयी है)

इस तरह जब स्वरों को नीचे से ऊपर सप्तक में गाया जाता है उसे आरोह कहते हैं। और ऊपर से नीचे गाते वक्त स्वरों को अवरोह में गाया जाना कहते हैं।

और कुछ अलंकार देखिये-

२)सासा रेरे गग मम पप धध निनि सांसां ।
सांसां निनि धध पप मम गग रेरे सासा।

३) सारेग, रेगम, गमप, मपध, पधनि, धनिसां।
सांनिध, निधप, धपम, पमग, मगरे, गरेसा।

४) सारे, रेग, गम, मप, पध, धनि, निसां।
सांनि, निध, धप, पम, मग, गरे, रेसा।

५) सारेगमप, रेगमपध, गमपधनि, मपधनिसां।
सांनिधपम, निधपमग, धपमगरे पमगरेसा।

६)सारेसारेग, रेगरेगम, गमगमप, मपमपध, पधपधनि, धनिधनिसां।
सांनिसांनिध, निधनिधप, धपधपम, पमपमग, मगमगरे, गरेगरेसा।

७)सारेगसारेगसारेसागरेसा, रेगमरेगमरेगरेमगरे, गमपगमपगमगपमग, मपधमपधमपमधपम, पधनिपधनिपधपनिधप, धनिसांधनिसांधनिधसांनिध, निसांरेनिसांरेनिसांनिरेंसांनि, सांरेंगंसांरेंगंसांरेंसांगंरेंसां।

सांरेंगंसांरेंगंसांरेंसांगंरेंसां, निसांरेनिसांरेनिसांनिरेंसांनि,धनिसांधनिसांधनिधसांनिध, पधनिपधनिपधपनिधप, मपधमपधमपमधपम, गमपगमपगमगपमग, रेगमरेगमरेगरेमगरे, सारेगसारेगसारेसागरेसा।


स्वरों और हारमोनियम के बारे में-

http://www.sharda.org/VocalLesson1F.html

http://www.sharda.org/VocalLesson2F.html

http://www.sharda.org/VocalLesson3F.html

(आभार: इस वेबसाइट की जितनी भी तारीफ़ की जाये कम है। मुझे खुशी है कि भारतीय संगीत के ऊपर ऐसा एक जालघर मौजूद है। गूगल सर्च करते वक्त इस वेबसाइट का पता चला मुझे।)

अगली बार संगीत संबंधी कुछ ज़रूरी परिभाषायें...






Sunday, May 21, 2006

संगीत

इस नये चिट्ठे को शुरु करने का उद्देश्य है उत्तर भारतीय शास्त्रीय संगीत के विभिन्न रागों पर जानकारी को एक जगह एकत्र करना। कुछ स्वतंत्र बंदिशें व समय-समय पर भजन/ग़ज़ल/गीत आदि की बंदिशों को भी इस चिट्ठे पर प्रकाशित किया जायेगा। हिन्दी में सवरलिपि को कैसे टाइप किया जा सकता है में शायद आप की मदद की ज़रूरत होगी।

भारतीय शास्त्रीय संगीत के बारे में अधिक जानकारी के लिये काफ़ी पहले लिखे मेरे
इस निबंध को दॆखें।

अगली बार बात करेंगे स्वरों के बारे में, हारमोनियम की कुछ जानकारी लेंगे, और कुछ शुरुआती स्वर अलंकारों के बारे में भी जानेंगे।