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Friday, February 05, 2010

राग पूरिया धनाश्री

तीव्रास्तु नि ग मा यस्यां कोमलौ धैवतरिषभौ।
पांशा संवादि ऋषभा, सायं पूरियाधनाश्रीका॥
--राग चन्द्रिकासार

राग पूरिया धनाश्री की विशेषतायें-


१)  थाट- पूर्वी


२) वादी- संवादी- पंचम व षडज


३) जाति- संपूर्ण संपूर्ण


४) कोमल स्वर- ऋषभ, धैवत
     तीव्र स्वर- मध्यम


५) गायन समय- सायंकाल


आरोह:  ऩि रे॒ ग म॑ प, म॑ ध॒ नि सां
अवरोह: रें॒ नि ध॒ प, म॑ ग, म॑ रे॒ ग, रे॒ सा
पकड़: ऩि रे॒ ग म॑ प, ध॒ प , म॑ ग म॑ रे॒ ग, रे॒ सा


६) यह राग पूरिया और धनाश्री रागों का मिश्रण है, मगर कई विद्वान इसे स्वतंत्र राग मानते हैं, क्यों कि प्रचलित धनाश्री राग काफ़ी थाट से उत्पन्न होता है। मगर अन्य विद्वानों का कहना है कि ये राग पूर्वी जन्य धनाश्री और पूरिया राग का मिश्रण है।


७) यह एक संधि प्रकाश राग है जो सायंकाल संधिक्षण में गाया बजाया जाता है।


८) म॑ रे॒ ग और रें॒ नि की संगति बहुत देखी जाती है इस राग में।


९) न्यास के स्वर हैं- सा, ग, प


१०)  विशेष स्वर संगतियाँ-


ऩि रे॒ ग म॑ प


(प), म॑ ग म॑ रे॒ ग


रें नि ध प, म॑ ग, म॑ रे॒ ग


इस राग के क़रीबी राग हैं - पूर्वी, जैताश्री आदि। 


आइये अब सुनते हैं पूरिया धनाश्री में भीमसेन जोशी का गाया प्रसिद्ध- पायलिया झंकार मोरी





और पंडित जसराज का गाया ये ख़्याल-








 

Saturday, September 26, 2009

राग यमन- परिचय और दो बंदिश

राग यमन-

प्रथम पहर निशि गाइये ग नि को कर संवाद
जाति संपूर्ण तीवर मध्यम यमन आश्रय राग

राग का परिचय -
1) इस राग को राग कल्याण के नाम से भी जाना जाता है। इस राग की उत्पत्ति कल्याण थाट से होती है अत: इसे आश्रय राग भी कहा जाता है (जब किसी राग की उत्पत्ति उसी नाम के थाट से हो)। मुगल शासन काल के दौरान, मुसलमानों ने इस राग को राग यमन अथवा राग इमन कहना शुरु किया।

2) इस राग की विशेषता है कि इसमें
तीव्र मध्यम का प्रयोग किया जाता है। बाक़ी सभी स्वर शुद्ध लगते हैं।

3) इस राग को
रात्रि के प्रथम प्रहर या संध्या समय गाया-बजाया जाता है। इसके आरोह और अवरोह में सभी स्वर प्रयुक्त होते हैं, अत: इसकी जाति हुई संपूर्ण-संपूर्ण (परिभाषा देखें)

4) वादी स्वर है- ग संवादी - नि

आरोह- ऩि रे ग, म॑ प, ध नि सां ।
अवरोह- सां नि ध प, म॑ ग रे सा ।
पकड़- ऩि रे ग रे, प रे, ऩि रे सा ।

विशेषतायें-

१) यमन और कल्याण भले ही एक राग हों मगर यमन और कल्याण दोनों के नाम को मिला देने से एक और राग की उत्पत्ति होती है जिसे राग यमन-कल्याण कहते हैं जिसमें दोनों मध्यम का प्रयोग होता है।

२) यमन को मंद्र सप्तक के नि से गाने-बजाने का चलन है। ऩि रे ग, म॑ ध नि सां

३) इस राग में ऩि रे और प रे का प्रयोग बार बार किया जाता है।

४) इस राग को गंभीर प्रकृति का राग माना गया है।

५)इस राग को तीनों सप्तकों में गाया-बजाया जाता है। कई राग सिर्फ़ मन्द्र, मध्य या तार सप्तक में ज़्यादा गाये बजाये जाते हैं, जैसे राग सोहनी तार सप्तक में ज़्यादा खुलता है।

इस राग में कई मशहूर फ़िल्मी गाने भी गाये गये हैं।

सरस्वती चंद्र से- चंदन सा बदन, चंचल चितवन
राम लखन से- बड़ा दुख दीन्हा मेरे लखन ने
चितचोर से- जब दीप जले आना
भीगी रात से- दिल जो न कह सका वो ही राज़े दिल ....आदि।


आइये अब सुनें रशीद खां साहब को उनके तराने के साथ यहाँ क्लिक कर के


और राग यमन में पंडित राजन साजन मिश्र से ये मशहूर बंदिश।


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Saturday, April 25, 2009

चैत में गाई जाने वाली चैती

चैत्र के महीने में गाई जाने वाली उप-शास्त्रीय संगीत में एक प्रकार की बंदिश है चैती। इसमें रामा शब्द का प्रयोग बार बार होता है और इसमें कोयल की कूक, विरह, प्रेम, साजन से प्रेम निवेदन, और कई बार राम जी का वर्णन होता है। क्योंकि चैत्र मास में होली आती है, कई बार चैती में होली का वर्णन भी होता है। मन को छूने वाली चैती की जन्मभूमि बनारस मानी जाती है। बिहार में भी चैती गाई जाती है।

आज शुभा मुद्गल की आवाज़ में सुनते हैं ये चैती-

सपना देखीला पलकनवा हो रामा, सैंया के आवनवा

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आभार- ईस्निप्स डाट काम

Saturday, March 28, 2009

नवरात्रि पर भवानी दयानी और राग भैरवी का परिचय

नवरात्रि के अवसर पर प्रस्तुत है राग भैरवी पर आधारित परवीन सुल्ताना द्वारा गाया विख्यात- भवानी दयानी...

आइये इस सुंदर भजन को सुनने से पहले राग भैरवी के बारे में जानें-

रे ग ध नि कोमल राखत, मानत मध्यम वादी।
प्रात: समय जाति संपूर्ण, सोहत सा संवादी॥

इस राग की उत्पत्ति ठाठ भैरवी से मानी गई है। इसमें रे, ग, ध, और नि, कोमल लगते हैं और म को वादी तथा सा को संवादी स्वर माना गया है। गायन समय प्रात:काल है।

मतभेद-
इस राग में कुछ संगीतज्ञ प सा किंतु अधिकांश म-सा वादी संवादी मानते हैं।

विशेषता-

१.ये एक अत्यंत मधुर राग है और इस कारण इसे सिर्फ़ प्रात: समय ही नहीं बल्कि हर समय गाते बजाते हैं। सभी समारोहों का समापन इसी राग से करने की प्रथा सी बन गयी है।

२.आजकल इस राग में बारहों स्वर प्रयोग किये जाने लगे हैं, भले ही इसके मूल रूप में शुद्ध रे, ग, ध, नि लगाना निषेध माना गया है।

३.इससे मिलता जुलता राग है- बिलासखानी तोड़ी।

आरोह- सा रे॒ ग॒ म प ध॒ नि॒ सां।
अवरोह- सां नि॒ ध॒ प म ग॒ रे॒ सा।
पकड़- म, ग॒ रे॒ ग॒, सा रे॒ सा, ध़॒ नि़॒ सा। (़ = मन्द्र स्वर)


भवानी दयानी
महा वाकवानी
सुर-नर-मुनि जनमानी
सकल बुधज्ञानी

जगजननी जगदानी
महिषासुर मर्दिनी
ज्वालामुखी चंडी
अमर पददानी

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(आभार: परवीन सुल्ताना का ये भजन मुझे ईस्निप्स.काम पर मिला।)

Saturday, March 07, 2009

दो बंगला होली गीत- अजय चक्रवर्ती और मानवेन्द्र/श्यामल मित्र

इस पोस्ट में होली के अवसर पर दो बंगला होली गीतों का आनंद लीजिये-

पहले पंडित अजय चक्रवर्ती की आवाज़ में-

होली खेलीछे श्याम कुंज कानने



फिर कई रागों का मिश्रण इस गीत में। बसंत राग की छाया में रचा गया ये गीत मानवेन्द्र मुखर्जी और श्यामल मित्र की आवाज़ में सुनिये-

सुंदर नटवर खेलत होरी-



सभी को २००९ में होली की शुभकामनायें।

Wednesday, January 28, 2009

बसंत

( picture location: Buchart Garden, Victoria, Canada)
बसंत द्वार पर खड़ा है। ऐसे में सुनते हैं ये मधुर राग पं. राजन साजन मिश्र की आवाज़ में।

संक्षिप्त परिचय राग बसंत-

"दो मध्यम कोमल ऋषभ चढ़त न पंचम कीन्ह।
स-म वादी संवादी ते, यह बसंत कह दीन्ह॥

आरोह- सा ग, म॑ ध॒ रें॒ सां, नि सां।
अवरोह- रें॒ नि ध॒ प, म॑ ग म॑ ऽ ग, म॑ ध॒ ग म॑ ग, रे॒ सा।
पकड़- म॑ ध॒ रें॒ सां, नि ध॒ प, म॑ ग म॑ ऽ ग।

थाट- पूर्वी (प्रचलित)

इस राग के बारे में कुछ मतभेद भी हैं। पहले मतानुसार इस राग में केवल तीव्र मध्यम का प्रयोग होना चाहिये, मगर दूसरे मतानुसार दोनो म का प्रयोग होना चाहिये जो कि आज प्रचलन में है।

विशेषता- उत्तरांग प्रधान राग होने की वजह से इसमें तार सप्तक का सा ख़ूब चमकता है। शुद्ध म का प्रयोग केवल आरोह में एक विशेष तरह से होता है- सा म, म ग, म॑ ध॒ सां।
गायन समय
- रात्रि का अंतिम प्रहर (मगर बसंत ऋतु में इसे हर समय गाया बजाया जा सकता है।

इसे परज राग से बचाने के लिये आरोह में नि का लंघन करते हैं-

सा ग म॑ ध॒ सां
या
सा ग म॑ ध॒ रें॒ सां

विशेष स्वर संगतियाँ-

१) प म॑ ग, म॑ ऽ ग
२) म॑ ध॒ रें सां
३) सा म ऽ म ग, म॑ ध॒ रें॒ सां


Wednesday, November 12, 2008

नानक भजन - पंडित राजन साजन मिश्र

गुरु पूर्णिमा के अवसर पर नानक भजन, पं. राजन-साजन मिश्र द्वारा गाया, प्रस्तुत है-

Monday, October 27, 2008

शुभ दीपावली- राग दीपक

दीवाली के अवसर पर राग दीपक में सितार, शुजात खां से सुनिये।

राग दीपक के बारे में ये कहानी प्रसिद्ध है कि इसे जब तानसेन ने गाया था, और उनके शरीर में आग जितनी गर्मी पैदा हो गई थी तब उनकी बेटी ने मल्हार गा कर उन्हें शांत किया था। राग दीपक का शुद्ध रूप अब नहीं देखने को मिलता है। कहते हैं कि अट्ठारह शताब्दि में ही ये राग लुप्त होने लगा था, क्योंकि इसके गाने से गायक के शरीर में अत्यधिक गर्मी पैदा होने लगती थी।

थोड़ी जानकारी राग दीपक के बारे में-

राग दीपक को कभी ठाठ पूर्वी, तो कभी ठाठ बिलावल तो कभी ठाठ खमाज के अंतर्गत गाया बजाया जाता है।


जाति: षाडव संपूर्ण
वादि: सा
संवादी: प
गायन समय: रात्रि का दूसरा प्रहर


आरोह- सा ग मे प, ध॒ नी सां।
अवरोह- सां ध॒ प, मे ग रे॒ सा।


आइये सुनते हैं इस कठिन राग को शुजात खां से, पूर्वी ठाठ का राग दीपक। इसमें राग श्री की भी छाया है और शुद्ध मध्यम का प्रयोग। (सितार वादन के साथ, कुछ गायन भी...)



सभी को दीपावली की हार्दिक शुभकामनायें।

आभार: http://www.sawf.org/

Monday, September 29, 2008

जय जय दुर्गे -राग दुर्गा- राजन साजन मिश्र

मुल्तानी राग को आगे बढ़ाने से पहले, ये पोस्ट नवरात्रि के अवसर पर कर रही हूँ। राग दुर्गा में गाया हुआ, ताल एकताल, छोटा खयाल, मध्यलय में ,बनारस घराने के पं. राजन-साजन मिश्र की आवाज़ में उनका सुप्रसिद्ध,

स्थाई-

जय जय दुर्गे माता भवानी
सब जगत को दुख हरणी

अंतरा-

पाप निवारणी, महिषासुर मर्दिनी
रा्मदास शरण गये भवानी दयानी शिवानी

राग दुर्गा के बारे में थोड़ी सी जानकारी-

ये राग, ठाठ बिलावल से उत्पन्न हुआ है और रात्रि के द्वितीय प्रहर में गाया-बजाया जाता है। इस राग में गंधार (ग) और निषाद (नि) का उपयोग नहीं होता है अर्थात ये स्वर वर्ज्य हैं। और बाक़ी सभी स्वर शुद्ध हैं। इस तरह इसकी जाति हुई औडव-औडव अर्थात आरोह में और अवरोह में पाँच स्वरों का प्रयोग। (परिभाषायें देखें)। वादी स्वर मध्यम (म) और संवादी स्वर षडज (सा) है।


आरोह- सा रे म रे प ध सां।
अवरोह - सां ध प ध म रे ध सा।
पकड़ - सा ध म प ध म रे ध़ सा।



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Monday, December 24, 2007

सरस्वती स्तोत्र (श्लोक)

किसी भी कर्यक्रम की शुरुआत आज भी भारत में देवी सरस्वती को नमन करके किया जाता है। प्रस्तुत है ये श्लोक जो हम बचपन में स्कूल के कार्यक्रमों में गाते थे।

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