Saturday, September 26, 2009

राग यमन- परिचय और दो बंदिश

राग यमन-

प्रथम पहर निशि गाइये ग नि को कर संवाद
जाति संपूर्ण तीवर मध्यम यमन आश्रय राग

राग का परिचय -
1) इस राग को राग कल्याण के नाम से भी जाना जाता है। इस राग की उत्पत्ति कल्याण थाट से होती है अत: इसे आश्रय राग भी कहा जाता है (जब किसी राग की उत्पत्ति उसी नाम के थाट से हो)। मुगल शासन काल के दौरान, मुसलमानों ने इस राग को राग यमन अथवा राग इमन कहना शुरु किया।

2) इस राग की विशेषता है कि इसमें
तीव्र मध्यम का प्रयोग किया जाता है। बाक़ी सभी स्वर शुद्ध लगते हैं।

3) इस राग को
रात्रि के प्रथम प्रहर या संध्या समय गाया-बजाया जाता है। इसके आरोह और अवरोह में सभी स्वर प्रयुक्त होते हैं, अत: इसकी जाति हुई संपूर्ण-संपूर्ण (परिभाषा देखें)

4) वादी स्वर है- ग संवादी - नि

आरोह- ऩि रे ग, म॑ प, ध नि सां ।
अवरोह- सां नि ध प, म॑ ग रे सा ।
पकड़- ऩि रे ग रे, प रे, ऩि रे सा ।

विशेषतायें-

१) यमन और कल्याण भले ही एक राग हों मगर यमन और कल्याण दोनों के नाम को मिला देने से एक और राग की उत्पत्ति होती है जिसे राग यमन-कल्याण कहते हैं जिसमें दोनों मध्यम का प्रयोग होता है।

२) यमन को मंद्र सप्तक के नि से गाने-बजाने का चलन है। ऩि रे ग, म॑ ध नि सां

३) इस राग में ऩि रे और प रे का प्रयोग बार बार किया जाता है।

४) इस राग को गंभीर प्रकृति का राग माना गया है।

५)इस राग को तीनों सप्तकों में गाया-बजाया जाता है। कई राग सिर्फ़ मन्द्र, मध्य या तार सप्तक में ज़्यादा गाये बजाये जाते हैं, जैसे राग सोहनी तार सप्तक में ज़्यादा खुलता है।

इस राग में कई मशहूर फ़िल्मी गाने भी गाये गये हैं।

सरस्वती चंद्र से- चंदन सा बदन, चंचल चितवन
राम लखन से- बड़ा दुख दीन्हा मेरे लखन ने
चितचोर से- जब दीप जले आना
भीगी रात से- दिल जो न कह सका वो ही राज़े दिल ....आदि।


आइये अब सुनें रशीद खां साहब को उनके तराने के साथ यहाँ क्लिक कर के


और राग यमन में पंडित राजन साजन मिश्र से ये मशहूर बंदिश।


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5 comments:

MUFLIS said...

संगीत परिशिष्ट में राग यमन और राग कल्याण
के बारे में जान कर बहुत अछा लगा .....
सिर्फ यमन कल्याण ही सुना था,,,,
और ये रट रखा था
कि इसमें तीव्र मध्यम का प्रयोग होता है ):
खैर ...
आज सब साफ़ हो गया तो और भी अछा लगा

कया ये गीत भी इसी में है....
"मन रे ...तू काहे ना धीर धरे ...."
या ऐसे ही खुश फ़हमी में ही हूँ
(नीम हकीम......!!)
और वो.....
"मितर पिआरे नूँ...हाल मुरीदाँ दा कहना...."
बस इतना-सा बता दीजिये ....
ज्यादा तंग नहीं करूंगा
कभी 'ललित' को
पोस्ट पर लगाएं ...तो पढ़ना चाहूँगा

अभिवादन .

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

पहली बार इस ब्लाग को देखा है। बहुत ही सुंदर ब्लाग है। बुक मार्क कर रहा हूँ।

Vivek Pohre said...

नमस्कार, मै राग यमन में बड़ा ख्याल सीख रहा हूँ | क्या मुझे कोई ये बता सकता है की अलाप की कल्पना नोम-तोम या आ-कार में कैसे करते हैं? मै स्वरों में आलाप तो ठीक ही कर लेता हूँ मगर आ-कार अथवा नोम-तोम में दिमाग काम ही नहीं करता |

Shreyang said...

@Vivek ji I can just say keep on practicing and understand everything in music you will get the aakar easily and to practice for your aakar practice alankaras in Aakar that is a good exercise :D

आनंदकृष्ण said...

आपके इस ब्लॉग के बारे मेन जानकारी नहीं थी । आज अचानक सर्च करता हुआ यहाँ पहुँच गया । बहुत अच्छा लगा ।