tag:blogger.com,1999:blog-285222762008-05-20T11:55:38.468-07:00संगीतManoshihttp://www.blogger.com/profile/13192804315253355418noreply@blogger.comBlogger7125tag:blogger.com,1999:blog-28522276.post-90571639442317969962007-12-24T06:47:00.000-08:002007-12-24T06:54:39.314-08:00सरस्वती स्तोत्र (श्लोक)किसी भी कर्यक्रम की शुरुआत आज भी भारत में देवी सरस्वती को नमन करके किया जाता है। प्रस्तुत है ये श्लोक जो हम बचपन में स्कूल के कार्यक्रमों में गाते थे।<br /><br /><table bgcolor="#000000" cellpadding="0" cellspacing="0"><tr><td><embed quality="high" pluginspage="http://www.macromedia.com/go/getflashplayer" type="application/x-shockwave-flash" bgcolor="#000" width="328" height="94" src="http://res0.esnips.com/escentral/images/widgets/flash/esnips_player.swf" flashvars="theTheme=blue&autoPlay=no&theFile=http://www.esnips.com//nsdoc/6e71c2c3-6303-48fa-8976-642e6ab0b878&theName=sarasawati shlok&thePlayerURL=http://res0.esnips.com/escentral/images/widgets/flash/mp3WidgetPlayer.swf"></embed></td></tr><tr><td><table cellpadding="2" style="font-family:Verdana, Arial, Helvetica, sans-serif; padding-left:2px; color:#FFFFFF; text-decoration:none ; ; font-size:10px; font-weight:bold"><tr><td><a style="color:#FFFFFF; text-decoration:none " href="http://www.esnips.com/CreateWidgetAction.ns?type=0&objectid=6e71c2c3-6303-48fa-8976-642e6ab0b878"> Get this widget </a></td><td style="font-size:7px; font-weight:normal;">|</td><td align="center"><a align="center" style="color:#FFFFFF; text-decoration:none " href="http://www.esnips.com/doc/6e71c2c3-6303-48fa-8976-642e6ab0b878/sarasawati-shlok/?widget=flash_player_esnips_blue"> Track details </a></td><td style="font-size:7px; font-weight:normal;">|</td><td><a align="center" style="color:#FF6600; text-decoration:none" href="http://www.esnips.com//adserver/?action=visit&cid=player_dna&url=/socialdna"> eSnips Social DNA </a></td></tr></table></td></tr></table><img style="visibility:hidden;width:0px;height:0px;" border=0 width=0 height=0 src="http://counters.gigya.com/wildfire/CIMP/Jmx*PTExOTg1MTg3Mzg*ODMmcHQ9MTE5ODUxOTIxMjExNCZwPTg2OTUxJmQ9dmlld2VyTVAzJm49.jpg" />Manoshihttp://www.blogger.com/profile/13192804315253355418noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-28522276.post-353825871283900292007-10-11T17:21:00.000-07:002007-12-17T16:41:04.943-08:00राग भूपाली -आगे (बंदिश सिखाने की कोशिश)<table bgcolor="#000000" cellpadding="0" cellspacing="0"><tbody><tr><td><embed quality="high" pluginspage="http://www.macromedia.com/go/getflashplayer" type="application/x-shockwave-flash" bgcolor="#000" src="http://res0.esnips.com/escentral/images/widgets/flash/esnips_player.swf" flashvars="theTheme=blue&autoPlay=no&theFile=http://www.esnips.com//nsdoc/32eb3501-ff9e-4284-8f85-cc2808e01645&theName=bhoopaalee&thePlayerURL=http://res0.esnips.com/escentral/images/widgets/flash/mp3WidgetPlayer.swf" height="94" width="328"></embed></td></tr><tr><td><table style="font-family: Verdana,Arial,Helvetica,sans-serif; padding-left: 2px; color: rgb(255, 255, 255); text-decoration: none; font-size: 10px; font-weight: bold;" cellpadding="2"><tbody><tr><td><a style="color: rgb(255, 255, 255); text-decoration: none;" href="http://www.esnips.com/CreateWidgetAction.ns?type=0&objectid=32eb3501-ff9e-4284-8f85-cc2808e01645"> Get this widget </a></td><td style="font-size: 7px; font-weight: normal;">|</td><td align="center"><a align="center" style="color: rgb(255, 255, 255); text-decoration: none;" href="http://www.esnips.com/doc/32eb3501-ff9e-4284-8f85-cc2808e01645/bhoopaalee/?widget=flash_player_esnips_blue"> Track details </a></td><td style="font-size: 7px; font-weight: normal;">|</td><td><a align="center" style="color: rgb(255, 102, 0); text-decoration: none;" href="http://www.esnips.com//adserver/?action=visit&cid=player_dna&url=/socialdna"> eSnips Social DNA </a></td></tr></tbody></table></td></tr></tbody></table><br /><br /><br />(सबसे पहले एक त्रुटि के लिये क्षमा याचना कर लूँ| रिकार्डिंग करते वक्त राग देसकार की वादी को मैंने प बताया, और दोबारा सुनने पर गलती का अहसास हुआ। राग देसकार का वादी स्वर ध है। (कभी अगर पूरी रिकार्डिंग फिर करूँ तो इस गलती को सुधार लिया जायेगा।)<br /><br />आज मैं पिछले लेख में लिखे भूपाली राग के बंदिश को गाने की कोशिश कर रही हूँ जिससे कि ये नये सीखने वालों के लिये आसान हो। कृपया पिछले लेखों को ध्यान से पढ़ें।<br /><br />गायक को कुछ बातों पर ध्यान देना चहिये । जैसे कि कुछ रागों के स्वर एक ही होते हैं मगर भिन्न स्वर समुह के प्रयोग से या न्यास के स्वर बदल जाने से, अथवा, राग के चलन से दोनों बिल्कुल एक स्वर वाले राग भी बिल्कुल पृथक होते हैं। अत: गाते बजाते समय इन बातों का खयाल रखना बहुत ज़रूरी है जिस<br /><br />राग भूपाली जैसा ही राग है- राग देसकार। दोनों में ही 'सा रे ग प ध' स्वरों का प्रयोग होता है, मगर दोंनों रागों का ठाठ अलग है, न्यास के स्वर अलग हैं और एक पूर्वांग तो दूसरा उत्तरांग प्रधान राग है।<br /><br />भूपाली में ध्यान दें कि सा ध़ सा रे ग का प्रयोग बहुत होता है। ये इसका मुख्य स्वर समुह है, ग का बहुतायत से प्रयोग होता है।<br /><br /><br /><br />http://www.sawf.org/audio/bhoop/fhk_bhoop.ram<br /><br />http://www.sawf.org/audio/bhoop/bgak_bhoop.ram<br /><br />http://www.sawf.org/newedit/edit08052002/musicarts.asp<br /><br />मैं इन सभी वेब साइट को प्रकाशित करने वालों की भूरि भूरि प्रशंसा करती हूँ और धन्यवाद ज्ञापन भी ।Manoshihttp://www.blogger.com/profile/13192804315253355418noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-28522276.post-1164745825425647202006-11-28T12:24:00.000-08:002007-02-14T06:16:32.654-08:00राग भूपाली (बंदिश और परिचय)राग भूपाली में बंदिश गाने से पहले निम्नलिखित आवश्यक जानकारी को पढ़ें:<br /><br /><strong>छोटा खयाल गाने की विधि:</strong><br />किसी भी राग में कोई भी बंदिश गाने से पहले उस राग विशेष का समां बाँधना ज़रूरी होता है। इसलिये, आरोह, अवरोह, पकड़, आलाप आदि गा कर राग को स्थापित किया जाता है। फिर बड़ा खयाल और छोटा खयाल आदि गा कर राग के स्वरूप को और निखारा जाता है। प्रचलन में पहले बड़ा खयाल (जो कि विलम्बित लय में चलता है) के बाद छोटे खयाल (मध्य या द्रुत लय) गाने की प्रथा है, पर कई बार गायक छोटा खयाल ऐसे भी गा सकता है। छोटे ख़याल को गाते समय उसे छोटे छोटे आलाप, और तानों से सँवारा जाता है। तान द्रुत गति से दुगुन या चौगुन में गाते हैं।<br /><br /><strong>स्वरलिपि:</strong> (मैं भातखंडे स्वरलिपि पद्धति का इस्तेमाल कर रही हूँ, जो कि एक सरल पद्धति है) । संगीत के छात्र को चाहिये कि वो पहले स्वरलिपि के स्वरों को याद कर के गाये और बाद में गीत के शब्द उनमें बैठा ले। अर्थात निम्नलिखित गाने में पहले सरलिपि के स्वरों को गा कर अभ्यास कर ले, फिर गीत के शव्दों को स्वरों मॆं ढाले।<br /><br /><strong>ताल और लय-</strong> किसी भी बंदिश को गाते समय ताल और लय का खयाल रखना ज़रूरी होता है। विभिन्न मात्राओं के विविध समुह को ताल कहते हैं। स्वर और लय ही संगी का आधार है। प्रत्येक ताल के कुछ निश्चित बोल होते हैं। बोल धा, धिन, कित, आदि वर्णों से निर्मित होते हैं। तीन ताल १६ मात्राओं का होता है।<br />सुविधा के लिये प्रत्येक ताल को छोटे छोटे विभागों में विभाजित किया गया है। प्रत्येक ताल के विभागों की संख्या निश्चित होती है। जैसे कि तीनताल में ४ विभाग हैं। गायक गाते समय हाथ से हर विभाग पर ताल देता है और उसे पता होता है कि वो किस मात्रा पर है। जिस मात्रा पर गाते समय ज़ोर पड़े वहाँ सम माना जाता है जो कि किसी भी ताल की पहली मात्रा मानी जाती है। सम को स्वरलिपि में एक क्रास चिन्ह से दर्शाया जाता है। सम के अलावा खाली (जहाँ तबले में ड्ग्गा नहीं बजता) और ताली अन्य विभागों की प्रथम मात्रा है। खाली को स्वरलिपि में शून्य से दर्शाया जाता है।<br /><br />राग भूपाली में निम्नलिखित बंदिश तीनताल में है।<br /><br /><strong>राग भूपाली</strong><br /><br /><strong><em>राग परिचय-</em></strong><br /><br />थाट- कल्याण<br />वर्जित स्वर- म, नि<br />जाति- औडव-औडव<br />वादी- ग<br />संवादी-ध<br />गायन समय- रात्रि का प्रथम प्रहर<br /><br />इस राग का चलन मुख्यत: मन्द्र और मध्य सप्तक के प्रतह्म हिस्से में होती है (पूर्वांग प्रधान राग)। इस राग में ठुमरी नहीं गायी जाती मगर, बड़ा खयाल, छोटा खयाल, तराना आदि गाया जाता है। कर्नाटक संगीत में इसे मोहन राग कहते हैं।<br /><br />आरोह- सा, रे, ग, प, ध, सा।<br />अवरोह- सां, ध, प, ग, रे, सा।<br />पकड़- प ग, रे ग।, सा रे, ध़ सा।<br /><br />छोटा खयाल- (तीन ताल मध्यलय)<br /><br />स्थाई<br /><br />धनधन कृष्न मुरारी तुम<br />कृष्न गोवर्धन धारी<br /><br />अंतरा<br /><br />कोई कहत तुम कृष्न कन्हैया<br />कोई कहत भव सिंद्युतरैया<br />कोई कहत तुम सबदुखहारी<br /><br /><em>स्वरलिपि:</em><br /><em><br /></em>स्थाई <em><br /></em><br />० --------२------------- x---------- ३---------<br />ग रे ग रे । सा ध़ सा रे । प - ग - रे ग सा रे<br />ध न ध न । कृ॒ ऽ ष्न मु । रा ऽ री ऽ । ऽ ऽ तु म ।<br /><br />ग - ग रे । ग प ध सां । धसां धप धसां रेंगं । रेंसां धप गरे सा<br />कृ ऽ ष्न गो। व र ध न। धाऽ ऽऽ ऽऽ ऽऽ । रीऽ ऽऽ ऽऽ ऽऽ ।<br /><br />अंतरा<br /><br />प - प ग । प प सां ध । सां - सां ध । सां - सां सां<br />को ऽ ई क । ह त तु म । कृ ऽ ष्न क । न्है ऽ या ऽ<br /><br />ध - ध ध । सां - सां रे । सां रें गं रें सां सां ध प ।<br />को ऽ ई क । ह त भ व । सिं ऽ द्यु त । रै ऽ या ऽ<br /><br />ग - ग - रे। ग प ध सां । धसां धप धसां रेंगं । रेंसां धप गरे सा<br />को ऽ ई क । ह त तु म। सऽ बऽ दुऽ खऽ । हाऽ ऽऽ रीऽ ऽऽ ।<br /><br />आभार:( गीत मेरे गुरु, श्रीमति जयश्री चक्रवर्ती से मुझे मिला था, मुझे ज्ञात नहीं कि ये कहाँ प्रकाशित हुआ होगा)<br /><br />तान: (चंद उदाहरण)<br /><br />खाली से ८ मात्रा बाद शुरु करें-<br /><br />१) सारे गप धसां धप। गप धप गरे सा<br />२) सारे गरे गप धसां । धप गरे गरे सा<br />३) सासा रेग रेग पध । सांध पग रेग सारे<br />४)सांसां धप गप धसां । रेंसां धप गरे सा<br /><br />१६ मात्रा बाद शुरु करें-<br /><br />१) सारे गरे साध़ सारे । गरे गप धप गरे । सारे गप धसां धप । रेंसां धप गरे सा।<br />२)गग रेग गसा रेरे । ध़सा साप पग पप ।गग रेग गरे रेसा । धध पप गरे सा।Manoshihttp://www.blogger.com/profile/13192804315253355418noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-28522276.post-1159274474945540682006-09-26T05:36:00.003-07:002006-09-26T05:47:10.806-07:00संगीत संबंधी कुछ ज़रूरी परिभाषायें -२<span style="font-size:130%;"><strong>थाट</strong>- सप्तक के १२ स्वरों में से ७ क्रमानुसार मुख्य स्वरों के समुदाय को थाट कहते हैं। थाट से राग उत्पन्न होते हैं। थाट को मेल भी कहा जाता है। थाट के कुछ लक्षण माने गये हैं- १) किसी भी थाट में कम से कम सात स्वरों का प्रयोग ज़रूरी है। २) थाट में स्वर स्वाभाविक क्रम में रहने चाहिये। अर्थात सा के बाद रे, रे के बाद ग आदि। ३) थाट को गाया ब्जाया नहीं जाता। इससे किसी राग की रचना की जाती है जिसे गाया बजाया जाता है। ४) एक थाट से कई रागों की उत्पत्ति हो सकती है। आज हिन्दुस्तानी संगीत पद्धति में १० ही थाट माने जाते हैं। </span><br /><span style="font-size:130%;"></span><br /><span style="font-size:130%;"><strong>विभिन्न थाटों के नाम व उनके स्वर-</strong> </span><br /><span style="font-size:130%;"></span><br /><span style="font-size:130%;">(नोट: कोमल स्वरों के नीचे एक रेखा दिखायी जाती है, जैसे ग॒। तीव्र म के ऊपर एक रेखा दिखायी जाती है जैसे- म॑) </span><br /><span style="font-size:130%;"></span><br /><span style="font-size:130%;">१) बिलावल थाट- सा, रे, ग, म, प, ध, नि </span><br /><span style="font-size:130%;"></span><br /><span style="font-size:130%;">२) कल्याण- सा, रे,ग, म॑, प ध, नि </span><br /><span style="font-size:130%;"></span><br /><span style="font-size:130%;">३) खमाज- सा, रे ग, म, प ध, नि॒ </span><br /><span style="font-size:130%;"></span><br /><span style="font-size:130%;">४) आसावरी- सा, रे, ग॒, म, प ध॒, नि॒ </span><br /><span style="font-size:130%;"></span><br /><span style="font-size:130%;">५) काफ़ी- सा, रे, ग॒,म, प, ध, नि॒ </span><br /><span style="font-size:130%;"></span><br /><span style="font-size:130%;">६) भैरवी- सा, रे॒, ग॒, म, प ध॒, नि॒ </span><br /><span style="font-size:130%;"></span><br /><span style="font-size:130%;">७) भैरव- सा, रे॒, ग, म, प, ध॒ नि </span><br /><span style="font-size:130%;"></span><br /><span style="font-size:130%;">८) मारवा- सा, रे॒, ग, म॑, प, ध नि </span><br /><span style="font-size:130%;"></span><br /><span style="font-size:130%;">९) पूर्वी- सा, रे॒, ग, म॑, प ध॒, नि </span><br /><span style="font-size:130%;"></span><br /><span style="font-size:130%;">१०) तोड़ी- सा, रे॒, ग॒, म॑, प, ध॒, नि </span><br /><span style="font-size:130%;"></span><br /><span style="font-size:130%;"><strong>राग</strong>- कम से कम पाँच और अधिक से अधिक ७ स्वरों से मिल कर बनता है राग। राग को गाया बजाया जाता है और ये कर्णप्रिय होता है। किसी राग विशेष को विभिन्न तरह से गा-बजा कर उसके लक्षण दिखाये जाते है, जैसे आलाप कर के या कोई बंदिश या गीत उस राग विशेष के स्वरों के अनुशासन में रहकर गा के आदि। </span><br /><span style="font-size:130%;"></span><br /><span style="font-size:130%;"><strong>पकड़</strong>- पकड़ वह छोटा सा स्वर समुदाय है जिसे गाने-बजाने से किसी राग विशेष का बोध हो जाये। उदाहरणार्थ- प रे ग रे, .नि रे सा गाने से कल्याण राग का बोध होता है। </span><br /><span style="font-size:130%;"></span><br /><span style="font-size:130%;"><strong>वर्ज्य स्वर</strong>- जिस स्वर का राग में प्रयोग नहीं होता है उसे वर्ज्य स्वर कहते हैं। जैसे कि राग भूपाली में सा, रे, ग, प, ध स्वर ही लगते हैं। अर्थात म और नि वर्ज्य स्वर हुये। </span><br /><span style="font-size:130%;"></span><br /><span style="font-size:130%;"><strong>जाति</strong>- किसी भी राग कि जाति मुख्यत: तीन तरह की मानी जाती है। १) औडव - जिस राग मॆं ५ स्वर लगें २) षाडव- राग में ६ स्वरों का प्रयोग हो ३) संपूर्ण- राग में सभी सात स्वरों का प्रयोग होता हो इसे आगे और विभाजित किया जा सकता है। जैसे- औडव-संपूर्ण अर्थात किसी राग विशेष में अगर आरोह में ५ मगर अवरोह में सातों स्वर लगें तो उसे औडव-संपूर्ण कहा जायेगा। इसी तरह, औडव-षाडव, षाडव-षाडव, षाडव-संपूर्ण, संपूर्ण-षाडव आदि रागों की जातियाँ हो सकती हैं। </span><br /><span style="font-size:130%;"></span><br /><span style="font-size:130%;"><strong>वादी स्वर</strong>- राग का सबसे महत्वपूर्ण स्वर वादी कहलाता है। इसे राग का राजा स्वर भी कहते हैं। इस स्वर पर सबसे ज़्यादा ठहरा जाता है और बार बार प्रयोग किया जाता है। किन्हीं दो रागों में एक जैसे स्वर होते हुये भी उन में वादी स्वर के प्रयोग के द्वारा आसानी से फ़र्क बताया जा सकता है। जैसे कि राग भूपाली में और राग देशकार में एक जैसे स्वर लगते हैं- सा, रे, ग, प, ध मगर राग भूपाली में ग वादी है और राग देशकार में ध स्वर को वादी माना गया है। इस तरह से दोनों रागों के स्वरूप बदल जाते हैं। </span><br /><span style="font-size:130%;"></span><br /><span style="font-size:130%;"><strong>संवादी स्वर</strong>- राग का द्वितीय महत्वपूर्ण स्वर होता है संवादी। इसे वादी से कम मगर अन्य स्वरों से ज़्यादा प्रयोग किया जाता है। इसे वादी स्वर का सहायक या राग का मंत्री स्वर भी कहते हैं। वादी और संवादी में ४-५ स्वरों की दूरी होती है। जैसे अगर किसी राग का वादी स्वर है रे तो संवादी शायद ध या नि हो सकता है। </span><br /><span style="font-size:130%;"></span><br /><span style="font-size:130%;"><strong>अनुवादी स्वर</strong>- वादी और संवादी के अलावा राग में प्रयुक्त होने वाले सभी अन्य स्वर अनुवादी कहलाते हैं। </span><br /><span style="font-size:130%;"></span><br /><span style="font-size:130%;"><strong>विवादी स्वर</strong>- जो स्वर राग में प्रयुक्त नहीं होता उसे विवादी कहते हैं। कभी कभी जब गायक या बजाने वाला राग का स्वरूप स्थापित कर लेता है, तो राग की सुंदरता बढ़ाने के लिये विवादी स्वर का प्रयोग कर सकता है, मगर विवादी स्वर का बार बार प्रयोग राग का स्वरूप बिगाड़ देता है। </span><br /><span style="font-size:130%;"></span><br /><span style="font-size:130%;"><strong>आलाप-</strong> राग के स्वरों को विलम्बित लय में विस्तार करने को आलाप कहते हैं। आलाप को आकार की सहायता से या नोम, तोम जैसे शब्दों का प्रयोग करके किया जा सकता है। गीत के शब्दों का प्रयोग कर के जब आलाप किया जाता है तो उसे बोल-आलाप कहते हैं। </span><br /><span style="font-size:130%;"></span><br /><span style="font-size:130%;"><strong>तान</strong>- राग के स्वरों को द्रुत गति से विस्तार करने को तान कहते हैं। तानों को आकार में या गीत के बोल के साथ (बोल-तान) अथवा स्वरों के प्रयोग द्वारा किया जा सकता है।</span><br /><br />(संगीत में परिभाषाओं का अंत नहीं। आगे की कड़ी मॆं हम किसी राग विशेष के बारे में जानने की कोशिश करेंगे और जब जहाँ भी ज़रूरत होगी आगे और परिभाषाओं से अवगत कराया जायेगा।)Manoshihttp://www.blogger.com/profile/13192804315253355418noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-28522276.post-1152718989002440702006-07-12T08:33:00.000-07:002006-07-12T08:50:24.593-07:00संगीत संबंधी कुछ ज़रूरी परिभाषायें -१<span style="font-size:130%;">आइये अब संगीत संबंधी कुछ परिभाषाओं पर ध्यान दें। </span><br /><br /><span style="font-size:130%;"><strong><u>संगीत-</u></strong> बोलचाल की भाषा में सिर्फ़ गायन को ही संगीत समझा जाता है मगर संगीत की भाषा में गायन, वादन व नृत्य तीनों के समुह को संगीत कहते हैं। संगीत वो ललित कला है जिसमें स्वर और लय के द्वारा हम अपने भावों को प्रकट करते हैं। कला की श्रेणी में ५ ललित कलायें आती हैं- संगीत, कविता, चित्रकला, मूर्तिकला और वास्तुकला। इन ललित कलाओं में संगीत को सर्वश्रेष्ठ माना गया है। </span><br /><br /><span style="font-size:130%;"><strong><u>संगीत पद्धतियाँ-</u></strong> भारतवर्ष में मुख्य दो प्रकार का संगीत प्रचार में है जिन्हें संगीत पद्धति कहते हैं। <em>उत्तरी संगीत पद्धति व दक्षिणी संगीत पद्धति </em>। ये दोनों पद्धतियाँ एक दूसरे से अलग ज़रूर हैं मगर कुछ बातें दोनों में समान रूप से पायी जाती हैं। </span><br /><br /><span style="font-size:130%;"><strong><u>ध्वनि-</u></strong> वो कुछ जो हम सुनते हैं वो ध्वनि है मगर संगीत का संबंध केवल उस ध्वनि से है जो मधुर है और कर्णप्रिय है। ध्वनि की उत्पत्ति कंपन से होती है। संगीत में <em>कंपन</em> (वाइब्रेशन) को <strong>आंदोलन</strong> कहते हैं। किसी वाद्य के तार को छेड़ने पर तार पहले ऊपर जाकर अपने स्थान पर आता है और फिर नीचे जाकर अपने स्थान पर आता है। इस प्रकार एक आंदोलन पूरा होता है। एक सेकंड मॆं तार जितनी बार आंदोलित होता है, उसकी <strong>आंदोलन संख्या</strong> उतनी मानी जाती है। जब किसी ध्वनि की आंदोलन एक गति में रहती है तो उसे <strong>नियमित</strong> और जब आंदोलन एक रफ़्तार में नहीं रहती तो उसे <strong>अनियमित आंदोलन</strong> कहते हैं। इस तरह जब किसी ध्वनि की अंदोलन कुछ देर तक चलती रहती है तो उसे <strong>स्थिर आंदोलन</strong> और जब वो जल्द ही समाप्त हो जाती है तो उसे<strong> अस्थिर आंदोलन</strong> कहते हैं।<br /></span><br /><span style="font-size:130%;"><strong><u>नाद-</u></strong> संगीत में उपयोग किये जाने वाली मधुर ध्वनि को नाद कहते हैं। अगर ध्वनि को धीरे से उत्पन्न किया जाये तो उसे <em>छोटा नाद</em> और ज़ोर से उत्पन्न किया जाये तो उसे <em>बड़ा नाद</em> कहते हैं।<br /><br /><strong><u>श्रुति-</u></strong> एक सप्तक (सात स्वरों का समुह) में सा से नि तक असंख्य नाद हो सकते हैं। मगर संगीतज्ञों का मानना है कि इन सभी नादों में से सिर्फ़ २२ ही संगीत में प्रयोग किये जा सकते हैं, जिन्हें ठीक से पहचाना जा सकता है। इन बाइस नादों को श्रुति कहते हैं।<br /><br /><strong><u>स्वर-</u></strong> २२ श्रुतियों में से मुख्य बारह श्रुतियों को स्वर कहते हैं। इन स्वरों के नाम हैं - सा(षडज), रे(ऋषभ), ग(गंधार), म(मध्यम), प(पंचम), ध(धैवत), नि(निषाद) अर्थात सा, रे, ग, म, प ध, नि स्वरों के दो प्रकार हैं- <em><strong>शुद्ध स्वर और विकृत स्वर।</strong></em> बारह स्वरों में से सात मुख्य स्वरों को शुद्ध स्वर कहते हैं अर्थात इन स्वरों को एक निश्चित स्थान दिया गया है और वो उस स्थान पर शुद्ध कहलाते हैं। इनमें से ५ स्वर ऐसे हैं जो शुद्ध भी हो सकते हैं और विकृत भी अर्थात शुद्ध स्वर अपने निश्चित स्थान से हट कर थोड़ा सा उतर जायें या चढ़ जायें तो वो विकृत हो जाते हैं। उदाहरणार्थ- अगर शुद्ध ग आठवीं श्रुति पर है और वो सातवीं श्रुति पर आ जाये और वैसे ही गाया बजाया जाये तो उसे विकृत ग कहेंगे। जब कोई स्वर अपनी शुद्ध प्रकार से नीचे होता है तो उसे कोमल विकृत और जब अपने निश्चित स्थान से ऊपर हट जाये और गाया जाये तो उसे तीव्र कहते हैं। सा और प <strong>अचल स्वर</strong> हैं जिनके सिर्फ़ शुद्ध रूप ही हो सकते हैं।<br /></span><br /><span style="font-size:130%;"><strong><u>सप्तक-</u></strong> क्रमानुसार सात शुद्ध स्वरों के समुह को सप्तक कहते हैं। ये सात स्वर हैं- सा, रे, ग, म, प, ध, नि । जैसे-जैसे हम सा से ऊपर चढ़ते जाते हैं, इन स्वरों की आंदोलन संख्या बढ़ती जाती है। 'प' की अंदोलन संख्या 'सा' से डेढ़ गुनी ज़्यादा होती है। 'सा' से 'नि' तक एक सप्तक होता है, 'नि' के बाद दूसरा सप्तक शुरु हो जाता है जो कि 'सा' से ही शुरु होगा मगर इस सप्तक के 'सा' की आंदोलन संख्या पिछले सप्तक के 'सा' से दुगुनी होगी। इस तरह कई सप्तक हो सकते हैं मगर गाने बजाने में तीन सप्तकों का प्रयोग करते हैं। </span><br /><span style="font-size:130%;">१) मन्द्र २) मध्य ३) तार । संगीतज्ञ साधारणत: <strong>मध्य सप्तक</strong> में गाता बजाता है और इस सप्तक के स्वरों का प्रयोग सबसे ज़्यादा करता है। मध्य सप्तक के पहले का सप्तक <strong>मंद्र </strong>और मध्य सप्तक के बाद आने वाला सप्तक<strong> तार सप्तक</strong> कहलाता है।</span><br /><br />क्रमश:Manoshihttp://www.blogger.com/profile/13192804315253355418noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-28522276.post-1148795956120485952006-05-27T22:58:00.000-07:002006-05-27T23:12:16.216-07:00सात स्वर, अलंकार और हारमोनियम<a href="http://photos1.blogger.com/blogger/4362/932/1600/Harmonium1C.jpg"><img style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; CURSOR: hand; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://photos1.blogger.com/blogger/4362/932/400/Harmonium1C.jpg" border="0" /></a><br /><span style="font-size:130%;">भारतीय संगीत आधारित है स्वरों और ताल के अनुशासित प्रयोग पर। सात स्वरों के समुह को <strong>सप्तक</strong> कहा जाता है। भारतीय संगीत सप्तक के सात स्वर हैं-<br /><br />सा(षडज), रे(ऋषभ), ग(गंधार), म(मध्यम), प(पंचम), ध(धैवत), नि(निषाद) </span><br /><span style="font-size:130%;"></span><br /><span style="font-size:130%;">अर्थात</span><br /><span style="font-size:130%;"></span><br /><span style="font-size:130%;"><span style="font-size:180%;">सा, रे, ग, म, प ध, नि</span><br /><br /><em>सा</em> और <em>प </em>को <strong>अचल स्वर</strong> माना जाता है। जबकि अन्य स्वरों के और भी रूप हो सकते हैं। जैसे <em>'रे' </em>को <em>'कोमल रे'</em> के रूप में गाया जा सकता है जो कि शुद्ध रे से अलग है। इसी तरह 'ग', 'ध' और 'नि' के भी कोमल रूप होते हैं। इसी तरह <em>'शुद्ध म'</em> को <em>'तीव्र म'</em> के रूप में अलग तरीके से गाया जाता है। </span><br /><span style="font-size:130%;"></span><br /><span style="font-size:130%;">गायक या वादक गाते या बजाते समय मूलत: जिस स्वर सप्तक का प्रयोग करता है उसे <strong>मध्य सप्तक</strong> कहते हैं। ठीक वही स्वर सप्तक, जब नीचे से गाया जाये तो उसे<strong> मंद्र,</strong> और ऊपर से गाया जाये तो <strong>तार सप्तक</strong> कह्ते हैं। मन्द्र स्वरों के नीचे एक बिन्दी लगा कर उन्हें मन्द्र बताया जाता है। और तार सप्तक के स्वरों को, ऊपर एक बिंदी लगा कर उन्हें तार सप्तक के रूप में दिखाया जाता है। इसी तरह अति मंद्र और अतितार सप्तक में भी स्वरों को गाया-बजाया जा सकता है।<br /></span><br /><span style="font-size:130%;">अर्थात- ध़ ऩि सा रे ग म प ध नि सां रें गं...</span><br /><span style="font-size:130%;"></span><br /><span style="font-size:130%;">संगीत के नये विद्यार्थी को सबसे पहले शुद्ध स्वर सप्तक के सातों स्वरों के विभिन्न प्रयोग के द्वारा आवाज़ साधने को कहा जाता है। इन को<strong> स्वर अलंकार</strong> कहते हैं।<br /><br />आइये कुछ अलंकार देखें<br /><br />१) सा रे ग म प ध नि सां <strong>(आरोह)</strong></span><strong><br /></strong><span style="font-size:130%;">सां नि ध प म ग रे सा <strong>(अवरोह)</strong></span><br /><span style="font-size:130%;"></span><br /><span style="font-size:130%;">(यहाँ आखिरी का सा तार सप्तक का है अत: इस सा के ऊपर बिंदी लगाई गयी है)</span><br /><span style="font-size:130%;"></span><br /><span style="font-size:130%;">इस तरह जब स्वरों को नीचे से ऊपर सप्तक में गाया जाता है उसे आरोह कहते हैं। और ऊपर से नीचे गाते वक्त स्वरों को अवरोह में गाया जाना कहते हैं। </span><br /><span style="font-size:130%;"></span><br /><span style="font-size:130%;">और कुछ अलंकार देखिये-</span><br /><span style="font-size:130%;"></span><br /><span style="font-size:130%;">२)सासा रेरे गग मम पप धध निनि सांसां । </span><br /><span style="font-size:130%;">सांसां निनि धध पप मम गग रेरे सासा।<br /></span><br /><span style="font-size:130%;">३) सारेग, रेगम, गमप, मपध, पधनि, धनिसां। </span><br /><span style="font-size:130%;">सांनिध, निधप, धपम, पमग, मगरे, गरेसा।</span><br /><br /><span style="font-size:130%;">४) सारे, रेग, गम, मप, पध, धनि, निसां। </span><br /><span style="font-size:130%;">सांनि, निध, धप, पम, मग, गरे, रेसा।</span><br /><br /><span style="font-size:130%;">५) सारेगमप, रेगमपध, गमपधनि, मपधनिसां। </span><br /><span style="font-size:130%;">सांनिधपम, निधपमग, धपमगरे पमगरेसा।</span><br /><br /><span style="font-size:130%;">६)सारेसारेग, रेगरेगम, गमगमप, मपमपध, पधपधनि, धनिधनिसां। </span><br /><span style="font-size:130%;">सांनिसांनिध, निधनिधप, धपधपम, पमपमग, मगमगरे, गरेगरेसा।</span><br /><br /><span style="font-size:130%;">७)सारेगसारेगसारेसागरेसा, रेगमरेगमरेगरेमगरे, गमपगमपगमगपमग, मपधमपधमपमधपम, पधनिपधनिपधपनिधप, धनिसांधनिसांधनिधसांनिध, निसांरेनिसांरेनिसांनिरेंसांनि, सांरेंगंसांरेंगंसांरेंसांगंरेंसां। </span><br /><span style="font-size:130%;"><br />सांरेंगंसांरेंगंसांरेंसांगंरेंसां, निसांरेनिसांरेनिसांनिरेंसांनि,धनिसांधनिसांधनिधसांनिध, पधनिपधनिपधपनिधप, मपधमपधमपमधपम, गमपगमपगमगपमग, रेगमरेगमरेगरेमगरे, सारेगसारेगसारेसागरेसा।</span><br /><br /><span style="font-size:130%;">स्वरों और <strong>हारमोनियम</strong> के बारे में-</span><br /><br /><a href="http://www.sharda.org/VocalLesson1F.html"><span style="color:#000099;">http://www.sharda.org/VocalLesson1F.html</span></a><span style="color:#000099;"><br /><br /></span><a href="http://www.sharda.org/VocalLesson2F.html"><span style="color:#000099;">http://www.sharda.org/VocalLesson2F.html</span></a><span style="color:#000099;"><br /></span><p><a href="http://www.sharda.org/VocalLesson3F.html"><span style="color:#000099;">http://www.sharda.org/VocalLesson3F.html</span></a></p><p>(आभार: इस वेबसाइट की जितनी भी तारीफ़ की जाये कम है। मुझे खुशी है कि भारतीय संगीत के ऊपर ऐसा एक जालघर मौजूद है। गूगल सर्च करते वक्त इस वेबसाइट का पता चला मुझे।)</p><p>अगली बार संगीत संबंधी कुछ ज़रूरी परिभाषायें...</p><p></p><p></p><p></p><br /><br /><br /><br /><br /><span style="font-size:130%;"></span>Manoshihttp://www.blogger.com/profile/13192804315253355418noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-28522276.post-1148279195184160582006-05-21T23:06:00.000-07:002006-05-21T23:27:52.193-07:00संगीत<span style="font-size:130%;">इस नये चिट्ठे को शुरु करने का उद्देश्य है उत्तर भारतीय शास्त्रीय संगीत के विभिन्न रागों पर जानकारी को एक जगह एकत्र करना। कुछ स्वतंत्र बंदिशें व समय-समय पर भजन/ग़ज़ल/गीत आदि की बंदिशों को भी इस चिट्ठे पर प्रकाशित किया जायेगा। हिन्दी में सवरलिपि को कैसे टाइप किया जा सकता है में शायद आप की मदद की ज़रूरत होगी।<br /><br />भारतीय शास्त्रीय संगीत के बारे में अधिक जानकारी के लिये काफ़ी पहले लिखे मेरे </span><a href="http://www.abhivyakti-hindi.org/snibandh/sanskriti/shastriya_sangeet.htm"><span style="font-size:130%;">इस निबंध </span></a><span style="font-size:130%;">को दॆखें।<br /><br />अगली बार बात करेंगे स्वरों के बारे में, हारमोनियम की कुछ जानकारी लेंगे, और कुछ शुरुआती स्वर अलंकारों के बारे में भी जानेंगे।</span>Manoshihttp://www.blogger.com/profile/13192804315253355418noreply@blogger.com